धूप
कवि: केदारनाथ अग्रवाल
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आई बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गई है, जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी लहँगे की लहराती लचती हवा चली है सारंगी बजती है खेतों की...
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

परिचय
कविताएँ
कवि: केदारनाथ अग्रवाल
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आई बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गई है, जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी लहँगे की लहराती लचती हवा चली है सारंगी बजती है खेतों की...
किताबें
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