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नेहरू

कैफ़ी आज़मी

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

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धूप

कवि: केदारनाथ अग्रवाल

धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने

मैके में आई बेटी की तरह मगन है

फूली सरसों की छाती से लिपट गई है,

जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं

भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी

लहँगे की लहराती लचती हवा चली है

सारंगी बजती है खेतों की...

धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने

मैके में आई बेटी की तरह मगन है

फूली सरसों की छाती से लिपट गई है,

जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं

भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी

लहँगे की लहराती लचती हवा चली है

सारंगी बजती है खेतों की गोदी में

दल के दल पक्षी उड़ते हैं मीठे स्वर के

अनावरण यह प्राकृत छवि की अमर भारती

रंग-बिरंगी पंखुरियों की खोल चेतना

सौरभ से मँह-मँह महकाती है दिगंत को

मानव मन को भर देती है दिव्य दीप्ति से

शिव के नंदी-सा नदिया में पानी पीता

निर्मल नभ अवनी के ऊपर बिसुध खड़ा है

काल काग की तरह ठूँठ पर गुमसुम बैठा

खोई आँखों देख रहा है दिवास्वप्न को

मूल भाषा: Hindi

© केदारनाथ अग्रवाल

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