इस कवि की कोई किताब अभी नहीं मिली
इस कवि से जुड़ी कोई किताब अभी अभिलेख में उपलब्ध नहीं है।
कैफ़ी आज़मी
बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

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