बेरोज़गार
कवि: पराग पावन
वे स्त्रियाँ याद आती हैं जो निमंत्रण की तरह आयी थीं और त्यौहारों की तरह चली गयीं जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?
कैफ़ी आज़मी
बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

परिचय
पराग पावन समकालीन हिंदी साहित्य के कवि हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार और आधुनिक जीवन के यथार्थ की स्पष्ट अभिव्यक्ति मिलती है। 'बेरोज़गार' उनकी प्रमुख कविताओं में से एक है।
कविताएँ
कवि: पराग पावन
वे स्त्रियाँ याद आती हैं जो निमंत्रण की तरह आयी थीं और त्यौहारों की तरह चली गयीं जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?
किताबें
इस कवि की कोई किताब अभी अभिलेख में उपलब्ध नहीं है।