बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले
कवि: भवानीप्रसाद मिश्र
बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले, उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले उनके ढंग से उड़े,, रुकें, खायें और गायें वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं
कैफ़ी आज़मी
बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

परिचय
भवानीप्रसाद मिश्र आधुनिक हिंदी साहित्य के मूर्धन्य कवि और 'दूसरा सप्तक' के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। आपकी काव्य-शैली अत्यंत सहज, व्यावहारिक और लयबद्ध है, जिसमें बोलचाल की भाषा के माध्यम से गंभीर संवेदनाएँ व्यक्त हुई हैं। 'गीत फ़रोश' और 'बुनी हुई रस्सी' जैसी कालजयी कृतियों के रचयिता मिश्र जी की कविताएँ गांधीवादी दर्शन और मानवीय सरोकारों से गहराई से जुड़ी हैं।
कविताएँ
कवि: भवानीप्रसाद मिश्र
बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले, उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले उनके ढंग से उड़े,, रुकें, खायें और गायें वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं
किताबें
इस कवि की कोई किताब अभी अभिलेख में उपलब्ध नहीं है।