बेरोज़गार
कवि: पराग पावन
वे स्त्रियाँ याद आती हैं जो निमंत्रण की तरह आयी थीं और त्यौहारों की तरह चली गयीं जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?
कैफ़ी आज़मी
बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

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कवि: पराग पावन
वे स्त्रियाँ याद आती हैं जो निमंत्रण की तरह आयी थीं और त्यौहारों की तरह चली गयीं जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?
कवि: मनीष कुमार यादव
खुद को गुवेरा, मुक्तिबोध, मार्क्स और विद्रोही की कड़ी का हिस्सा मानने वाले ये दोस्त चाहते हैं दूर रखना अपनी ज़िन्दगी को विचारधारा और आन्दोलन के साए से भी