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सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है


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इस किताब की कविताएँ
कवि: विहाग वैभव
अल्लाह के बाग़ान में जिन्हें उधम कर दौड़ जाना था अगले आँगन वे बम से फटी सड़क पर गला फाड़ रोते हुए अपनी माँ के चिथे स्तन चूम रहे हैं
कवि: विहाग वैभव
प्रिय आयोजक! उपकृत कर देने के दंभ से लबालब आपका कविता पाठ का निमंत्रण मिला शुक्रिया, पर क्षमा करें नहीं आ सकूँगा, अक्षम हूँ