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नेहरू

कैफ़ी आज़मी

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

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अनवांटेड 72

कवि: अंकिता रासुरी

‘अनवांटेड 72’ प्रेम के नाम पर

रात दिन सड़ती-गलती मेरी ज़िंदगी

मेरा शरीर ख़तरनाक स्थिति तक टूटता रहा

कंपनियाँ कभी नहीं कहतीं कि यह दवा नहीं एक धीमा ज़हर है

सेक्स करना भी कितना ख़तरनाक साबित हो चुका है मेरे लिए

एक पीढ़ी जो मुझे डराती रही इज़्ज़त के ख़याल से

दूसरी पीढ़ी मुझे देती रही नसीहतें

और मैं हर सेक्स के बाद लेती रही

‘अनवांटेड 72’ प्रेम के नाम पर

रात दिन सड़ती-गलती मेरी ज़िंदगी

मेरा शरीर ख़तरनाक स्थिति तक टूटता रहा

कंपनियाँ कभी नहीं कहतीं कि यह दवा नहीं एक धीमा ज़हर है

और आज मैं एक हॉस्पिटल के बेड पर हूँ

आई.सी.यू. में जाते हुए मैं बस सोचती रही हमारे बारे में

और तुम थे कि ख़ुद को ही गुनहगार समझ रहे थे

हमारे सामने कितना कुछ था चुनौती के रूप में

एक परंपरा जो मुझे माँ के रूप में नहीं करती स्वीकार

इन अस्पताल वालों को नहीं फ़र्क़ पड़ता हमारे प्रेम से

जहाँ ज़िंदगी और मौत का फ़ासला

महज़ पचास हज़ार के एडवांस पर टिका था

न इन कंपनियों को

जो बहत्तर घंटे के ज़हर के साथ बेचती हैं प्रेम के सपने

मेरे शरीर में न जाने कितने इंजेक्शन लगे पड़े थे

तुम्हारी प्यार भरी और बेबस आँखों के सामने

और अंत क्या हो सकता है

सब कुछ तो ख़तरनाक बना दिया गया है—

एक स्त्री शरीर के लिए

मूल भाषा: Hindi

© अंकिता रासुरी

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