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नेहरू

कैफ़ी आज़मी

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

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राजनीति की सड़क पर

कवि: जसिंता केरकेटा

अब यह लिंग

धीरे-धीरे बन्दूक में तब्दील हो रहा है

इसके ज़रिए एक साथ

किसी ख़ास समुदाय का बलात्कार किया जाएगा

बलात्कारियों ने अपने लिंग को

किसी धारदार हथियार में बदल लिया है

वे इसके साथ निकल रहे हैं

और स्त्री की देह के साथ-साथ

उसकी आत्मा को रेत रहे हैं

समाज जिसने उन्हें बचपन से धार दी है

वह अपने हाथ की करतूतों की शिनाख़्त नहीं चाहता

चौराहे पर सिर्फ़ कोई सज़ा माँगता है

अब यह लिंग

धीरे-धीरे बन्दूक में तब्दील हो रहा है

इसके ज़रिए एक साथ

किसी ख़ास समुदाय का बलात्कार किया जाएगा

उसकी देह के साथ उसकी आत्मा को तोड़ा जाएगा

और बलात्कार के ख़िलाफ़ खड़े लोगों को

चौराहों तक समेट दिया जाएगा

वह कौन है जिसका मुँह

हमेशा कुछ ज़्यादा खाने को खुला रहता है

और जो झपट्टा मारने के लिए अपने पंजे को

अलग-अलग तरीक़े से धार देता रहता है

अनाज का स्वाद किसे सीठा लगने लगा है

और कौन है जो अब

धरती की पूरी कोख खाना चाहता है

वह कौन है जो पूरी निष्ठा से

अपनी जीभ के साथ

सबकी लार की भी चिंता कर रहा है

उसने स्त्री की कुचली आत्मा को

राजनीति की सड़क पर लिटा दिया है

सबूतों को कहीं झाड़ियों में छिपा दिया है

और हत्यारों की आर्थिक स्थिति ठीक करने में

जी जान से जुटा हुआ है

उसने सज़ा की माँग करती

चौराहों पर चीख़ती तख़्तियों को

अपने लिए किसी ढाल में बदल लिया है

और इस ढाल के पीछे उसका चेहरा छिप गया है

वह चिल्लाकर आश्वासन दे रहा है

धीरज रखिए…

किसी को नहीं छोड़ा जाएगा

अपनी पूरी ताक़त के साथ

किसी समुदाय के बलात्कार के बाद

वह आपकी माँगों की ओर मुख़ातिब होगा।

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