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नेहरू

कैफ़ी आज़मी

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

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राह तो एक थी

कवि: शमशेर बहादुर सिंह

राह तो एक थी हम दोनों की आप किधर से आए गए

हम जो लुट गए पिट गए, आप तो राजभवन में पाए गए

राह तो एक थी हम दोनों की आप किधर से आए गए

हम जो लुट गए पिट गए, आप तो राजभवन में पाए गए

किस लीला युग में आ पहुँचे अपनी सदी के अंत में हम

नेता, जैसे घास फूस के रावण खड़े कराए गए

जितना ही लाउडस्पीकर चीख़ा उतना ही ईश्वर दूर हुआ

उतने ही दंगे फैले जितने 'दीन धरम' फैलाए गए

दादा की गोद में पोता बैठा 'महबूबा! महबूबा गाए

दादी बैठी मूड़ हिलाए हम किस जुग में आए गए

गीत ग़ज़ल है फ़िल्मी लय में शुद्ध गलेबाज़ी शमशेर

आज कहां वो गीत जो कल थे गलियों गलियों गाए गए

मूल भाषा: Hindi

© शमशेर बहादुर सिंह

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