मुख्य सामग्री पर जाएँ
महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ
आप कविताबोल की नई वेबसाईट का BETA संस्करण देख रहे हैं। इस्तेमाल के दौरान प्रकाशित सामग्री में कुछ त्रुटियाँ अथवा उपलब्ध सुविधाओं में असंगतियां हो सकती हैं। अपने सुझाव हमें भेजने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें
सभी सूचनाएँ
← कविताओं पर लौटें

कविता का वीडियो देखें

राह तो एक थी

कवि: शमशेर बहादुर सिंह

राह तो एक थी हम दोनों की आप किधर से आए गए

हम जो लुट गए पिट गए, आप तो राजभवन में पाए गए

राह तो एक थी हम दोनों की आप किधर से आए गए

हम जो लुट गए पिट गए, आप तो राजभवन में पाए गए

किस लीला युग में आ पहुँचे अपनी सदी के अंत में हम

नेता, जैसे घास फूस के रावण खड़े कराए गए

जितना ही लाउडस्पीकर चीख़ा उतना ही ईश्वर दूर हुआ

उतने ही दंगे फैले जितने 'दीन धरम' फैलाए गए

दादा की गोद में पोता बैठा 'महबूबा! महबूबा गाए

दादी बैठी मूड़ हिलाए हम किस जुग में आए गए

गीत ग़ज़ल है फ़िल्मी लय में शुद्ध गलेबाज़ी शमशेर

आज कहां वो गीत जो कल थे गलियों गलियों गाए गए

मूल भाषा: Hindi

© शमशेर बहादुर सिंह

कविता साझा करें