मुख्य सामग्री पर जाएँ
महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ
आप कविताबोल की नई वेबसाईट का BETA संस्करण देख रहे हैं। इस्तेमाल के दौरान प्रकाशित सामग्री में कुछ त्रुटियाँ अथवा उपलब्ध सुविधाओं में असंगतियां हो सकती हैं। अपने सुझाव हमें भेजने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें
सभी सूचनाएँ

नेहरू

कैफ़ी आज़मी

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

← कविताओं पर लौटें

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है

कवि: कुंवर नारायण

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है

पहला प्यार

ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में…

कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में:

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है

पहला प्यार

ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में…

कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में:

दूसरा प्यार

बहन की कोमल छाया में

एक सेनेटोरियम की उदासी तक :

फिर नासमझी की भाषा में

एक लौ को पकड़ने की कोशिश में

जला बैठा था अपनी उंगुलियां:

एक परदे के दूसरी तरफ़

खिली धूप में खिलता गुलाब

बेचैन शब्द

जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था

धीरे धीरे जाना

प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में

देशी-विदेशी

और विश्वास किया कि प्यार की भाषा

सब जगह एक ही है

लेकिन जल्दी ही जाना

कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है:

एक-से घरों में रहते हैं

तरह-तरह के लोग

जिनसे बनते हैं

दूरियों के भूगोल…

अगला प्यार

भूली बिसरी यादों की

ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते

केवल कुछ अधमिटे अक्षर

कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं

जिन्हें किसी तरह जोड़कर

हम बनाते हैं

प्यार की भाषा

मूल भाषा: Hindi

© कुंवर नारायण

कविता साझा करें