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नेहरू

कैफ़ी आज़मी

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

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मानव

कवि: सुमित्रानंदन पंत

सुन्दर हैं विहग, सुमन सुन्दर,

मानव! तुम सबसे सुन्दरतम,

निर्मित सबकी तिल-सुषमा से

तुम निखिल सृष्टि में चिर निरुपम!

यौवन-ज्वाला से वेष्टित तन,

मृदु-त्वच, सौन्दर्य-प्ररोह अंग,

न्योछावर जिन पर निखिल प्रकृति,

छाया-प्रकाश के र...

सुन्दर हैं विहग, सुमन सुन्दर,

मानव! तुम सबसे सुन्दरतम,

निर्मित सबकी तिल-सुषमा से

तुम निखिल सृष्टि में चिर निरुपम!

यौवन-ज्वाला से वेष्टित तन,

मृदु-त्वच, सौन्दर्य-प्ररोह अंग,

न्योछावर जिन पर निखिल प्रकृति,

छाया-प्रकाश के रूप-रंग!

धावित कृश नील शिराओं में

मदिरा से मादक रुधिर-धार,

आँखें हैं दो लावण्य-लोक,

स्वर में निसर्ग-संगीत-सार!

पृथु उर, उरोज, ज्यों सर, सरोज,

दृढ़ बाहु प्रलम्ब प्रेम-बन्धन,

पीनोरु स्कन्ध जीवन-तरु के,

कर, पद, अंगुलि, नख-शिख शोभन!

यौवन की मांसल, स्वस्थ गंध,

नव युग्मों का जीवनोत्सर्ग!

अह्लाद अखिल, सौन्दर्य अखिल,

आः प्रथम-प्रेम का मधुर स्वर्ग!

आशाभिलाष, उच्चाकांक्षा,

उद्यम अजस्र, विघ्नों पर जय,

विश्वास, असद् सद् का विवेक,

दृढ़ श्रद्धा, सत्य-प्रेम अक्षय!

मानसी भूतियाँ ये अमन्द,

सहृदयता, त्याद, सहानुभूति,--

हो स्तम्भ सभ्यता के पार्थिव,

संस्कृति स्वर्गीय,--स्वभाव-पूर्ति!

मानव का मानव पर प्रत्यय,

परिचय, मानवता का विकास,

विज्ञान-ज्ञान का अन्वेषण,

सब एक, एक सब में प्रकाश!

प्रभु का अनन्त वरदान तुम्हें,

उपभोग करो प्रतिक्षण नव-नव,

क्या कमी तुम्हें है त्रिभुवन में

यदि बने रह सको तुम मानव!

मूल भाषा: Hindi

© सुमित्रानंदन पंत

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