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नेहरू

कैफ़ी आज़मी

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

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बीस साल बाद

कवि: सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

मगर यह वक़्त घबराए हुए लोगों की शर्म

आँकने का नहीं

और न यह पूछने का—

कि संत और सिपाही में

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!

बीस साल बाद

मेरे चेहरे में

वे आँखें वापस लौट आई हैं

जिनसे मैंने पहली बार जंगल देखा है :

हरे रंग का एक ठोस सैलाब जिसमें सभी पेड़ डूब गए हैं।

और जहाँ हर चेतावनी

ख़तरे को टालने के बाद

एक हरी आँख बन कर रह गई है।

बीस साल बाद

मैं अपने-आपसे एक सवाल करता हूँ

जानवर बनने के लिए कितने सब्र की ज़रूरत होती है?

और बिना किसी उत्तर के चुपचाप

आगे बढ़ जाता हूँ

क्योंकि आजकल मौसम का मिज़ाज यूँ है

कि ख़ून में उड़ने वाली पत्तियों का पीछा करना

लगभग बेमानी है

दुपहर हो चुकी है

हर तरफ़ ताले लटक रहे हैं

दीवारों से चिपके गोली के छर्रों

और सड़कों पर बिखरे जूतों की भाषा में

एक दुर्घटना लिखी गई है

हवा से फड़फड़ाते हिंदुस्तान के नक़्शे पर

गाय ने गोबर कर दिया है

मगर यह वक़्त घबराए हुए लोगों की शर्म

आँकने का नहीं

और न यह पूछने का—

कि संत और सिपाही में

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!

आह! वापस लौटकर

छूटे हुए जूतों में पैर डालने का वक़्त यह नहीं है

बीस साल बाद और इस शरीर में

सुनसान गलियों से चोरों की तरह गुज़रते हुए

अपने-आपसे सवाल करता हूँ—

क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है

जिन्हें एक पहिया ढोता है

या इसका कोई ख़ास मतलब होता है?

और बिना किसी उत्तर के आगे बढ़ जाता हूँ

चुपचाप !

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