मुख्य सामग्री पर जाएँ
महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ
आप कविताबोल की नई वेबसाईट का BETA संस्करण देख रहे हैं। इस्तेमाल के दौरान प्रकाशित सामग्री में कुछ त्रुटियाँ अथवा उपलब्ध सुविधाओं में असंगतियां हो सकती हैं। अपने सुझाव हमें भेजने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें
सभी सूचनाएँ

नेहरू

कैफ़ी आज़मी

बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा

← कविताओं पर लौटें

बर्बरता की ढाल ठाकरे

कवि: नागार्जुन

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

कैसे फ़ासिस्टी प्रभुओं की --

गला रहा है दाल ठाकरे !

अबे सँभल जा, वो पहुँचा बाल ठाकरे !

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

कैसे फ़ासिस्टी प्रभुओं की --

गला रहा है दाल ठाकरे !

अबे सँभल जा, वो पहुँचा बाल ठाकरे !

सबने हाँ की, कौन ना करे !

छिप जा, मत तू उधर ताक रे !

शिव-सेना की वर्दी डाटे, जमा रहा लय-ताल ठाकरे !

सभी डर गए, बजा रहा है गाल ठाकरे !

गूँज रहीं सह्याद्री घाटियाँ, मचा रहा भूचाल ठाकरे !

मन ही मन कहते राजा जी, जिये भला सौ साल ठाकरे !

चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !

कौन नहीं फँसता है देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

बर्बरता की ढाल ठाकरे !

प्रजातन्त्र का काल ठाकरे !

धन-पिशाच का इंगित पाकर, ऊँचा करता भाल ठाकरे !

चला पूछने मुसोलिनी से, अपने दिल का हाल ठाकरे !

बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे !

मूल भाषा: Hindi

© नागार्जुन

कविता साझा करें