बेरोज़गार शीर्षक के अंतर्गत कवि पराग पावन ने लगभग तीस कविताओं की एक श्रृंखला की रचना की है जिनमें से यहॉं 19वी, 20वी तथा 21वी कविताएँ प्रस्तुत हैं, जिन्हें हमारे यू-ट्यूब चैनल पर पढ़ा गया है।
(19)
क्या बेरोज़गारी में
आपको माँ की याद आती है?
और बचपन की?
और उन दोस्तों की
जो फटी जेब से सिक्कों की तरह
कहीं गिर गए?
वे स्त्रियाँ याद आती हैं
जो निमंत्रण की तरह आयी थीं
और त्यौहारों की तरह चली गयीं
जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?
क्या बेरोज़गारी में आप भी
कोई भी शब्द उठाकर
पत्थर में बदल देते हैं?
(20)
इतनी परीक्षाएँ देते थे बेरोज़गार
क्या उनका जन्म सिर्फ़ परीक्षाओं के लिए हुआ था
काग़ज़ के बाहर तक की असंख्य परीक्षाएँ
वे किसी से हाथ मिलाते हुए भी हल करते थे
कितने सारे सवाल
जिनके जवाब किसी कुंजी में नहीं थे
जो उत्तर दे सकते थे
वही लुटेरे थे उत्तरपुस्तिकाओं के
नौकरियों में भ्रष्टाचार की स्थिति क्या थी
यह बताते भाषा अपने हाथ खड़े कर देती
और फ़र्ज़ी डिग्रियों के बारे में क्या कहना
वह तो हत्यारों के पास भी थीं।
(21)
कभी-कभी मिलने आते ताक़त के दलाल
कहते कि एक मामूली समझदारी और समझौते से
ख़त्म हो सकती है तुम्हारी बेरोज़गारी
वे बताते थे कि शक्ति के समीकरणों में
हम कहाँ थे और कहाँ हो सकते थे
मात्र एक अल्पकालिक वैचारिक समर्पण से
पर जाने क्या उगता था हमारे खेतों में
कि हमारी जाँघें अकड़ती थीं
और ताक़त की सबसे महँगी मिठाई पर
हम थूक-थूक देते थे।

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