लाश! लाश! लाश!
छुन्ने मामा के खेत पर लाश
मर्द खेत की तरफ जाने वाले कच्चे रास्ते की तरफ भागने लगे
औरतें एक जगह इकठ्ठी होकर खुसुर- फुसुर करने लगी
बच्चे खेल रहे थे,
उन्हें लगा यह भी कोई नया खेल है
वे भी भागने लगे
भागते भागते मर्द आगे निकल गए
बच्चे पीछे रह गए
बच्चे पूरी ताकत लगाकर दौड़ रहे थे
पर आखिर थे तो बच्चे
रास्ते में उन्हें तरबूज के खेत मिले
खरबूज के खेत मिले
पके आम के पेड़ मिले
पर उन्होंने किसी भी फल को ललचाकर नहीं देखा
वे बस भागते रहे
उन्हें लाश देखनी थी
उन्हें लगा लाश आसमान में उड़ने वाले हवाई-जहाज की तरह होगी
उन्हें लगा लाश तेज धूप, तेज बारिश, या फिर तेज हवा की तरह होगी
थोड़ी देर बाद वे अपने लक्ष्य तक पहुँच गए
परती पड़े एक खेत पर ‘एक जवान औरत की लाश’ पड़ी थी
उसने नींबू रंग का एक सुंदर सलवार-सूट पहना था
उसके माथे पर एक छोटी सी बिंदी थी
उसके हाथ पैर के नाखूनों में मैरुन रंग की नेल-पॉलिश लगी थी
जो आधी आधी छूटी थी
उसने पैरों में बिछिए नहीं पहने थे
उसने हाथों में कांच की चूड़ियाँ नहीं पहनी थी
मर्दों ने इससे तय किया ‘जवान लड़की की लाश’ है
बच्चे देखने लगे लाश का मुँह न काला था न गोरा
बच्चे देखने लगे लाश के मुँह पर न रोने का भाव था न हंसने का
बच्चे देखने लगे लाश के गले पर सूखा हुआ ख़ून था
बच्चे देखने लगे लाश के पास एक मैली सी चप्पल थी
बच्चे डर गए
तो लाश मम्मी, बुआ, चाची, दीदी… की तरह होती है
बच्चे भाग आए
और अपनी-अपनी माँओं की गोद में दुबक गए
उन्होंने मन ही मन तय किया अब कभी नहीं जाएंगे लाश का खेल देखने
क्या देखा?
क्या देखा?
बच्चे एक स्वर में बोले
‘जवान लड़की की लाश’
मार डाला, फेंक डाला
औरतें आपस में बोलीं
किसने मारा?
कोई बोली बाप ने
कोई बोली भाई ने
कोई बोली जीजा ने
कोई बोली प्रेमी ने
कहाँ मारा?
रेल में मारा
घर में मारा
बाग़ में मारा
कहाँ की थी?
कोई बोली गाँव की थी
कोई बोली शहर की थी
औरतें देर तक लाश का गीत गाती रहीं
बच्चे लाश का गीत सुनते-सुनते सो गए
उन्हें फिर ख़्वाब भी आए
तो ‘जवान लड़की की लाश’ के आए

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