यह कविताओं को खेतों में जोतने का समय है

प्रिय आयोजक!
उपकृत कर देने के दंभ से लबालब आपका कविता पाठ का निमंत्रण मिला
शुक्रिया, पर क्षमा करें नहीं आ सकूँगा, अक्षम हूँ

नहीं, ऐसी कोई खास व्यस्तता नहीं है,
बस एक अधिक ज़रूरी काम आन पड़ा है
मैं मेरे कवि को लेकर एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रहा हूँ।

असीम पुरातन घृणा की जायी देश की सरकार ने
मेरे पाठकों और विरोधियों और नागरिकों से अपने ही देश की नागरिकता के सबूत मांगे हैं

मेरा एक पाठक बेघर है,
जिसके पुरखों को पिछली सरकार ने गोकशी के संदेह में कत्ल कर डाला था
मुझे उसके लिए जाना होगा

मेरा एक विरोधी है
जिसके इकलौते तीन डिसमिल खेत के क़ागज़ात को ठाकुर ने
जाति की आग में जला डाला था
मुझे उसके लिए जाना होगा

एक और शख़्स है जिससे मनुष्यता के अलावा कोई अतिरिक्त रिश्ता नहीं है
वह मुंबई, कोलकाता, सूरत, नोएडा, कानपुर, बनारस, हैदराबाद कहीं भी
आपको दिख सकता है
अपनी नाज़ुक गुलमोहर सी बच्ची की लाल चोटी के लिए
तीन रुपये के रिबन का मोलभाव करता हुआ
वह किसी भी नुकक्ड़, किसी भी ठेले पर आपको दिख सकता है

अन्न की भूख मृत्यु को बहुत हरामी बना देती है
यह कविताओं को खेतों में जोतने का समय है

चिमनी से उठता हुआ धुआं मजूर के परिवार के फेफड़े में काली खाँसी की तरह जमता जाता है
यह कविताओं को कारख़ानों में नाधने का समय है

भूख के युद्ध से बची हुई शक्ल शहर की भीड़ में बंजारा हो जाती है
और सात समंदर घृणा के विष से जन्मी सरकारें बंजारा होने को देश के लिए ख़तरा बताती हैं
यही सही समय है कि मनुष्यता के हक़ में मेरी कविताएं रक्तदान करें
यही सही समय है कि कविताएं इस ग्रह पर मनुष्य की आदिम बाशिंदगी के हक़ में गवाही दें
और अपने होने का मूल्य अदा करें

हर कविता भाषा के कोश से मनुष्य का लियो हुआ उधार है

जब कविताओं की सबसे ज्यादा ज़रूरत सड़कों पर उतर आए
मेरे साथियों की थरथराती आवाज़ और तनी हुई मुट्ठी को है
तब आपके सभागार में कालजयिता के लोभ का पाठ करती हुई मेरी कविताएँ
बेहद अश्लील दिखाई पड़ेंगी महोदय
आपके निमंत्रण में दस हजार का वादा है
दस हजार से मुझे याद आता है –
पुश्तैनी पीड़ाओं के संग्रहालय उस मेरे गाँव में
ख़ून के रिश्ते से इतर मेरे एक चाचा थे
कहने को तो कमाने गए थे सूरत
पर सरकार की नालायकी छिपाने के लिए
ख़ून बेचकर इतना ही पैसा भेजा करते थे साल-दर-साल
वे तो नहीं लौटे, उनकी लाश लौटी
उनकी आठ साल की बेटी को चीख-चीख कर
धरती की छाती फाड़ते हुए
मैंने देखा था श्रीमान
मनुष्य के ख़ून के साथ इससे भद्दा मज़ाक क्या हो सकता है महोदय

धार्मिक परिभाषाओं के इतर आत्मा नाम की एक चीज़ होती है
इससे पहले की मेरा ईमान मेरी आत्मा को सत्तर चाकू गोदकर मार डाले
मुझे इस शांति मार्च में जाना होगा
मुझे हर उस विरोध मार्च में जाना होगा जहाँ कविताओं के बाहर इंसान का
निचाट बदन लाठी चार्ज झेल रहा है
जैसा कि पिछली सदी के एक कवि ने कहा था
मनुष्य कविताओं-फविताओं से बहुत बड़ा है श्रीमान

मनुष्य कविताओं से बहुत पहले का है
वह कविताओं के बहुत बाद तक रहेगा
यही सही समय है कि मैं अपने कवि को लेकर
ख़ेतों में नध जाऊँ
सड़कों पर उतरूँ और सरकार से लड़ जाऊँ
फिर फर्क नहीं पड़ता जीतूँ या मर जाऊँ।


इस कविता को शेयर करें


Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *